Sunday, May 6, 2007

रियलिटी की हकीकत

शुरु हो गया आज से महायुद्ध....
अफसोस कि इसमें किसी की जान नहीं जाएगी...
अफसोस कि इसमें सरकार की किरकिरी नहीं होगी...
ये अफसोस जनता नहीं करेगी...
ये अफसोस देश की सरकार भी नहीं करेगी...
क्योंकि सरोकार न सरकार को होगा...

न ही जनता को होगा...
सरोकार होगा संगीत के ठेकेदारों का...
हां... सीधे पिसेगी जनता भी और सरकार भी...
क्योंकि मिसाइलें बॉर्डर पर नहीं चल रही..
बल्कि घरों में चलेंगी..
धुनों की मिसाइलें...
सुरों की मिसाइलें...
बनाना जो है शहंशाह...
ढुंढना जो है मोती...
इस भीड़ के समंदर से ...
लेकिन रेत के नीचे दबेंगी...
कई जिंदगियां... कई उम्मीदें...

दिखानी है फिर किसी की बादशाहत...
करना है फिर किसी को उम्मीदों की कश्ती पर सवार....
करनी हैं लोगों की जेबे ढीलीं...
खेलना है उनके आंसुओं से...
और ढकेलना है सरकार को भी...
आखिर प्रतिभा का सवाल है....
आखिर जिम्मेदारी का सवाल है...
बजेंगे ढोल-नगारे...
दबेंगी उम्मीदें भविष्य बनाने की...
दबेंगी उम्मीदें अपने पैरों पर खड़े होने की...

दबेगा सच....
दबेगी रियलिटी...
क्योंकि यही रियलिटी का सच है...
यही बुद्धु बक्से की हकीकत है...

Sunday, April 29, 2007

सच.. यही आखिरी नहीं

चंद सच्चाईयां...
जिनसे हम भागते हैं....
चंद फसाने...
जिसके पीछे हम भागते हैं...
बच हम उन सच्चाईयों से भी नहीं पाते...
पकड़ हम उन फसानों को भी नहीं पाते...
तो रहते हैं कहां !!!!
सच और फसानों की पगडंडी के बीच...
लेकिन कभी-कभी ये भी पतली होती जाती है और तब...
आसरा होता है केवल उस रास्ते का
जिसपे सच भी होता है...
और फसाना भी...

खबर... हकीकत और फसाना... या कुछ और ???

खबर बनाते हैं हम...
खबर चलाते हैं हम...
क्योंकि खबर पहचानते हैं हम...
जिंदगी की पहचान हैं हमें...
जिंदगी की कीमत मालूम हैं हमें...
क्योंकि जिंदगी बनाते और चलाते हैं हम...
सबसे तेज भी हैं हम...
सबको आगे रखा भी है हमने...
खबर हर कीमत पर दिखाते हैं हम...
हकीकत है यही...
और फसाना भी...
खबर वही जो हम दिखाएं...

Wednesday, April 25, 2007

हो गई साल की सबसे बड़ी शादी

बंध गया सेहरा... उठ गयी डोली...
रश्मि निषाद

साल की सबसे बड़ी शादी के रुप में चर्चा हो रही ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन की शादी आखिरकार हो ही गई। दुल्हन आखिर विदा हो गयी। ये रियल लाइफ की शायद ऐसी पहली शादी थी, जिसमें रील लाइफ का ड्रामा भी था, रोमांस भी था, इमोशन भी मौजूद था, एक्शन भी था और क्लाईमेक्स भी। इस फिल्म की पटकथा भले ही कम समय में लिखी गई हो लेकिन लोकेशन पर देश की मीडिया ने इसे इतना लंबा खींचा जैसे समूचे देश की सियासत अभिनय करने को मौजूद हो। शादी के बाद देश भर का माहौल कुछ ऐसा हुआ मानो दीवाली या ईद का त्योहार अभी-अभी बीता हो । और देश का मीडिया उसी शादी का पंडित, बैंडवाला, कैटरर ,मेंहदीवाला, सजावटवाला, घोड़ीवाला आदि सब कुछ बन चुका था। यही नहीं शादी के बाद का हिसाब लगाने की जिम्मेवारी भी मीडिया ने ही उठा रखी थी। हालांकि ये दीगर बात थी कि देश की इस सबसे बड़ी शादी से मीडिया को उतना ही दूर रखा गया जितना चिंगारी को कुनबे से। इसके बावजूद अगर इस शादी का शुभाकांक्षी मीडिया को रखना गलत नहीं होगा।
बहरहाल, बात अगर हो ही रही है देश की सबसे बड़ी शादी की तो एक नजर तैयारियो के ताम-झाम पर डाल ही ली जाए। अमिताभ के बंगले जलसा से प्रतीक्षा तक लोगों और मीडियाकर्मियों का हुजूम इतना था कि अमिताभ को निजी सुरक्षाकर्मियों के साथ-साथ पुलिस भी बुलानी पड़ी । बस ये नहीं पता चल पाया कि पुलिस भीड़ को काबू में करने के लिए थी या मीडिया को ?
बनारस की शेरवानी, मुजफ्फरपुर की लहठी, राजस्थान की मेंहदी वगैरह-वगैरह तो थे ही लेकिन इन सबसे ज्यादा विवाद का विषय रहा, कौन शरीक हो रहा है और किससे कन्नी काटी जा रही है! सो मीडिया की असीम अनुकंपा से समूचा बॉलीवु़ड दो खेमों में बंट गया।एक वो लोग थे जो प्रतीक्षा के बाहर खड़े होकर हाथ हिला सके और दूसरे वो थे जिन्हें मीडिया के सामने बाइट देनी पड़ी कि उन्हें याद नहीं किया गया है। बंटी की बबली अर्थात रानी मुखर्जी और जोधा-अकबर के जोधा, रितिक रोशन को इन खुशियों से मरहूम रहना पड़ा।जय-वीरु के जय, ध्रमेंद्र: तीनों मशहूर खान-शाहरुख खान,आमिर खान और सलमान खान भी तशरीफ नहीं ला सके और न जाने कितने नाम हैं जो इस घटना के बाद इसी की वजह से चर्चा में रहेंगे। इसके कारणों के पीछे नहीं जाते हैं
क्योंकि ये अलग विवाद का विषय है।अब अगर चाहने वालों की फेहरिस्त देखें तो कानपुर के ठग्गु के लड्डू बनाने वाले की हसरत थी कि वे अमिताभ की बहू का मुंह मीठा करा सके । इसी तरह जया के हाथों में उनकी शादी के समय मेंहदी लगाने वाली की तमन्ना थी कि वह जया की वधू के हाथों में मेंहदी लगा सके। अभिषेक के हमशक्ल की हसरत थी ऐश भाभी को फूल देने की तो सलमान के डुप्लीकेट भी घर में प्रवेश पाने की जुगत में दिखे। और जिन लोगो के दिल टूटे उनका कहना ही क्या! सिनेंमा के रुपहले पर्दे से लेकर मायानगरी तक न जाने कितने किस्से आम रहे जिनका हिसाब आने वाले समय में फिल्म और गॉसिप की मैगजीन दिया करेंगी। हालांकि उसकी एक झलक शादी के दिन ही दिखाई पड़ी जब अभिषेक के 'प्रेम' में पागल एक लड़की ने खुदकुशी करने की कोशिश की । कुछ ऐसा ही पागलपन शादी के अगले ही दिन पत्रकारों का दिखा जिसका भूत अमिताभजी के संकट मोचक अमर सिंह के सुरक्षाकर्मियों ने उतार दिया।
दीवानगी का तो आलम ये था कि अगर मणिरत्णम ने फिल्म गुरु न बनाई होती तो ऐश के फेरे न हो पाते और जेपी दत्ता ने उमराव जान न बनाई होती तो ऐश के हाथों में मेंहदी न रच पाती ।क्य़ोंकि इन्हीं फिल्मों के दृश्यों से रचे गये तमाम मीडिया में शादी के विजुअल। देश-विदेश की सारी हलचलें इस 'सुनामी' की भेंट हो गईं और खाक हो गये वो सारे मुद्दे भी जो बदकिस्मती से उस समय दस्तक दे पाये। उत्तरप्रदेश में हो रहे चुनावों को जगह नहीं मिल पा रही थीं भला हो कि किसी नेता का कोई सनसनीखेज बयान अभी सामने नहीं आया।गौरतलब है कि इस पर अभ्यास उसी समय कर लिया गया था जब ऐश के मांगलिक होने और पीपल से शादी जैसी खबरे तवज्जो पाने लगी थीं। बीजेपी की सीडी दब गई तो राहुल की जुबानी गांधी परिवार का महिमामंडन छिप गया। अव्वल देश की जनता ने टीम इंडिया को माफी दे दी और पुतला फूंकनें वाले घर पर तस्वीरों में ऐश के ढूंढने में लगे रहे। दुनिया का शोर दब गया इन पर फिल्माये युगल गीतों की धुनों पर।
अब सवाल ये उठता है कि क्या देश की जनता इस "महाशादी" के लिए तैयार थी या फिर उन्हें पिछले काफी अरसे मानसिक रुप से तैयार किय़ा जा रहा था। काफी हद तक 14 जनवरी को हुई मेंहदी की रस्म में इसकी झलक दिखला दी गई थी । लेकिन हकीकत कुछ और ही बयान करती है, 60-70 फीसद दर्शक "साल के इस सबसे बड़ी शादी " के अतिप्रसारण के खिलाफ थे। बुद्दिजीवी वर्ग के एक बड़े धड़े का मानना है कि इसके माध्यम से आने वाले समय में खबरों को तराशने की एक ऐसी परंपरा शुरु करने की कोशिश की जा रही जिसके बाद खुशियां पर्दे से उतरकर समाज में बिखरी हुई नजर आये। ये फीलगुड का ऐसा पैमाना तैयार करने की कोशिश है जिसे जब चाहे छलका के दर्शकों की प्यास बुझाई जा सके।
आने वाले समय में निश्चित ही बहस-मुहासिबों का दौर चलेगा लेकिन इतना तो तय है कि अभिषेक-ऐशवर्या की शादी से इस परंपरा की शुरुआत तो हो ही गयी है कि अब जिस किसी सेलिब्रिटी के घर शहनाई बजेगी उसी समय मीडिया हिसाब लगायेगा कि कौन शरीक हुआ और किससे मुंह मोड़ा गया ! सो इंतजार है इस नये मीडिया ट्रेंड के समाज के ऊपर छाने का और वापस मीडिया के बीन बजाने का।

हम सब एक हैं... यही हमारी अभिव्यक्ति है...

लो हम आ गए..
खुद को बताने.. खुद को जताने...
खुद से बाते करने..खुद की बात करवाने...
खुद के बारे में सोंचने... खुद को अपने बारे में सोंचने पर मजबूर करने...
मजबूरी मर्जी की... मजबूरी खुशी की...
आखिर जरुरत ही है ऐसी मजबूरी की...
क्योंकि होने वाला ही है हमसे जमाना...
क्योंकि होने वाली ही है चर्चा हमारी...
आखिर हमसे ही हम हैं....
आखिर यही हमारी अभिव्यक्ति है....